सोंचती हूँ की आज मैं आजाद हूँ,
पर हर कदम डर-डर कर आगे बढ़ा रही।
न जाने क्यूँ, आज भी, रौशनी में
अपनी ही परछाई से डर गई।
काली- भयावह उन रातों की तरह,
जो पहले हमने देखे थे,
अचानक मेरी पर्छाएं लगने लगी।
डर कर जल्दी से आगे बढ़ना चाहा
मगर बढ़ न सकी, लगा की
बाँध गए मेरे पांव कई बेडियों से,
और बुजदिली बढ़ने लगी।
आंखों में दंगों में बुझते जीवन की तरह,
चमक गायब- सी होने लगी,
नाम किस किस के गिनु जिसकी वजह से उम्मीद की रौशनी मध्हम पर्ने लगी।
उस हर बुरे की बेदी पड़ी थी पांवों में।
जकडे हुए क़दमों ने मुझे बताया
की आज भी मैं आजाद नहीं हूँ।
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nice post !!!!
ReplyDeletethanx,yaar
ReplyDeleteman ki gahraiyon se nikli ek behtreen post ...aap bahut achchha likhti hain ...
ReplyDeleteMeri Kalm - Meri Abhivyakti